अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अपने आक्रामक कूटनीतिक रुख से वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है. इस बार निशाने पर रणनीतिक रूप से बेहद अहम ग्रीनलैंड है. ट्रंप ने चेतावनी दी है कि जो देश ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण की उनकी योजना का समर्थन नहीं करेंगे, उन पर टैरिफ लगाया जा सकता है. इस बयान के बाद यूरोपीय सहयोगी देशों के साथ तनाव और गहरा गया है.
ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की धमकी
व्हाइट हाउस में एक इवेंट के दौरान ट्रंप ने कहा, ‘अगर कुछ देश ग्रीनलैंड के मुद्दे पर साथ नहीं देते, तो मैं उन पर टैरिफ लगा सकता हूं, क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए हमें ग्रीनलैंड की जरूरत है. यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने टैरिफ और आर्थिक दबाव को कूटनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की बात कही हो. इससे पहले उनका प्रशासन रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर टैरिफ लगा चुका है और हाल ही में ईरान से व्यापार करने वाले देशों पर व्यापक प्रतिबंध लागू किए गए थे. अब ट्रंप ने यही रणनीति ग्रीनलैंड के मुद्दे पर अपनाने का संकेत दिया है.
इस बीच अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच वाशिंगटन में आमने-सामने बैठक भी हुई. बैठक में अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और विदेश मंत्री मार्को रुबियो शामिल थे. डेनमार्क के विदेश मंत्री लार्स लोके रासमुसेन ने बैठक के बाद कहा कि दोनों पक्षों के बीच अब भी ‘असहमति’ बनी हुई है. उन्होंने साफ किया कि डेनमार्क को यह उम्मीद नहीं थी कि अमेरिका अपना रुख बदलेगा.
अमेरिका-यूरोप में बढ़ा तनाव
हालांकि मतभेदों के बावजूद, तीनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए हैं कि एक हाई-लेवल वर्किंग ग्रुप बनाया जाएगा, जो संभावित समझौते के रास्ते तलाशेगा. रासमुसेन ने कहा कि यह समूह अमेरिका की सुरक्षा चिंताओं को समझते हुए डेनमार्क की “रेड लाइन्स” का सम्मान करेगा.
इधर, कूटनीतिक बातचीत के बीच डेनमार्क ने ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने का ऐलान किया है. फ्रांस, जर्मनी, नॉर्वे और स्वीडन ने भी डेनमार्क के समर्थन में सीमित संख्या में सैनिक भेजने की घोषणा की है. अधिकारियों ने इसे कोपेनहेगन के प्रति एक प्रतीकात्मक लेकिन स्पष्ट समर्थन बताया है. ब्रिटेन और जर्मनी ने भी आर्कटिक सुरक्षा अभ्यास के तहत सीमित तैनाती की पुष्टि की है.
ग्रीनलैंड पर नियंत्रण की जिद
डेनमार्क के रक्षा मंत्री ट्रोएल्स लुंड पाउल्सन ने कहा कि लक्ष्य आर्कटिक क्षेत्र में अधिक स्थायी सैन्य मौजूदगी की दिशा में काम करना और सहयोगी देशों के साथ संयुक्त अभ्यास का विस्तार करना है. पूरे घटनाक्रम ने आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को उजागर कर दिया है. इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने नाटो से अपील की है कि वह क्षेत्र में एक “समन्वित उपस्थिति” विकसित करे, ताकि तनाव को रोका जा सके और बाहरी हस्तक्षेप का मुकाबला किया जा सके.
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