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कोरोना वायरस: बेघरों को ‘वाहे गुरु जी की रोटियों’ का सहारा

दिल्ली में 264 रैन बसेरे हैं जिन्हें सड़कों पर भटकने वाले उन लोगों के लिए बनाया गया है जिनका कोई नहीं है. इनमें से बहुत सारे ऐसे भी हैं जो या तो काफ़ी बूढ़े हो चुके हैं या फिर विकलांग हैं और मज़दूरी या कोई दूसरा काम नहीं कर सकते.

Image Courtesy BBC HINDI

लॉकडाउन शुरू होने तक इन रैन बसेरों में जितने लोग रह सकते थे, रह रहे थे. लेकिन कोरोना वायरस की वजह से सामाजिक दूरी का पालन भी करना था तो इनमें रहने वालों की संख्या बीस प्रतिशत कर दी गयी.

लॉकडाउन की वजह से सब कुछ बंद हो गया और दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड ने 25 मार्च को एक अध्यादेश के ज़रिये घोषणा की कि रैन बसेरों में रहने वालों के लिए पके हुए खाने का इंतज़ाम भी किया जाएगा.

इसको लेकर दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के नेतृत्व में एक नौ सदस्यों की समिति का गठन किया गया जिसमें राज्य सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) को भी शामिल किया गया.

इस समिति के ज़रिये ही लॉकडाउन में फँसे दूसरे प्रदेशों से आए मज़दूरों के लिए पके हुए भोजन के इंतज़ाम का भी दावा किया गया. मगर इसी महीने की 2 तारीख़ को दिल्ली सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायलय को बताया कि रैन बसेरों में मिलने वाले पके हुए भोजन की व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से बंद कर दिया गया है.

इस क़दम से उन तमाम लोगों के सामने दो वक़्त के भोजन की समस्या पैदा हो गयी जिनके पास न तो करने को कोई काम है और ना ही रहने की कोई जगह.

बेघर लोगों के बीच काम कर रहे सुनील कुमार अलेडिया कहते हैं कि रैन बसेरों में सामाजिक दूरी बनाने की वजह से जो क्षमता 20 प्रतिशत की गयी उसकी वजह से बेघर और बेसहारा लोग एक बार फिर फ़ुटपाथ पर आ गए. चिलचिलाती धुप में वो दोहरी मार झेल रहे हैं.

वो कहते हैं, “पहले तो ये था चलो फ़ुटपाथ पर सो जाएंगे या किसी पुल के नीचे छाँव में बैठ जाएंगे, लेकिन खाना तो मिलेगा. मगर पके हुए खाने को बंद करने के फ़ैसले के बाद अब बेघर लोगों को दोहरा संघर्ष करना पड़ रहा है. एक, ख़ुद को कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाना और दू़रा भूख से बचाना.”

सामाजिक कार्यकर्ता अचम्भे में हैं कि जब अर्थ व्यवस्था पूरी तरह से नहीं खुली है और बहुत सारी दुकानें, उद्योग और व्यावसायिक प्रतिष्ठान बंद ही पड़े हैं, ऐसे में बेघर लोगों को न तो मज़दूरी मिल पा रही है और ना ही भीख. लॉकडाउन के शुरुआती दौर में कई सामाजिक संगठन पका हुआ खाना लेकर बेघर लोगों में बांटते थे. अब वो काम बंद हो चुका है.

दिल्ली के कश्मीरी गेट के पास यमुना पुस्ता के इलाक़े में भी कुछ रैन बसेरे बने हुए हैं जिन्हें दिल्ली सरकार ने बनाया था. लेकिन 11 अप्रैल को इनमें से एक रेन बसेरे में आग लग गई और वो पूरी तरह जलकर राख हो गया. इस इलाक़े में 6000 लोग रहते थे और इन्हें यहाँ खाना भी मिलता था. रैन बसेरे की एक इकाई के जल जाने के बाद कुल मिलाकर अब इनमें अन्दर रहने वालों की संख्या 200 के आस पास ही रह गयी है जबकि बाक़ी के लोग फ़ुटपाथ पर या फिर यमुना के किनारे रह रहे हैं.

सुनील अलेडिया का कहना है कि दिल्ली में जो सरकारी रैन बसेरे हैं उनमें 50 हज़ार के क़रीब बेघर रहते रहे हैं. लगभग उतने ही लोग पूरी दिल्ली में ऐसे भी हैं जिनको रैन बसेरे नसीब नहीं हैं और वो फ़ुटपाथ पर ही रहते हैं तो कुल मिलाकर दिल्ली में बेघरों की संख्या एक लाख के आस-पास है.

यमुना पुस्ता के रैन बसेरे में मेरी मुलाक़ात निर्मल दा (बदला हुआ नाम) से हुई जो कोलकाता से दिल्ली काम करने आए थे और मज़दूरी करके अपना गुज़ारा करते थे. दिन भर काम करते और रात को रैन बसेरे में पनाह लेते थे. अब उनका रैन बसेरा भी जल गया है और उनको काम भी नहीं मिल रहा है.

यहीं के रहने वाले उमेश अपने थैले से दो रोटियाँ निकालकर दिखाते हैं. पूछने पर वो कहते हैं, “ये वाहे गुरु जी की रोटियाँ हैं. सुबह सुबह मिलती हैं. मैं दोबारा लाइन में लगकर दो रोटी और ले लेता हूँ. इन्हें बचाकर रखता हूँ. रात को जब भूख लगती है तो इन्हें खा लेता हूँ.”

कई लोग ऐसा ही करते हैं.

उमेश, शीशगंज गुरुद्वारे का ज़िक्र कर रहे हैं जहाँ से हर सुबह लंगर आता है. मगर इस इलाक़े में बेघरों की संख्या इतनी है कि सबको इसका लाभ नहीं मिल सकता. हालांकि ये लंगर इनके ज़िंदा रहने का एक मात्र ज़रिया ही है.

इसी इलाक़े में एक मंदिर भी है. मगर वो बंद पड़ा है. लोग बताते हैं कि जब श्रद्धालु मंदिर आते थे तो दान पुण्य का काम भी करते थे. वहां भी उन्हें खाना मिल जाता था. अब मंदिर लॉक डाउन के बाद से बंद है. लोग भी नहीं आ रहे हैं. इन बेघरों के लिए ये सहारा भी चला गया.

दिल्ली का दिल कहलाने वाले इलाक़े में बंगला साहिब गुरुद्वारा भी है. गुरुद्वारे के ठीक पीछे रैन बसेरा भी है. लेकिन गुरुद्वारे का जहाँ लंगर बनता है उसके पुनर्निर्माण का काम चल रहा है. इसलिए पिछले तीन महीनों से यहाँ लंगर नहीं बन पा रहा है.

ममता देवी (बदला हुआ नाम) इसी रैन बसेरे में रहती हैं. वो पहले तो बच्चों को पढ़ाकर गुज़ारा कर लेती थीं, मगर अब उनकी उम्र काफ़ी हो गयी है. उनके परिवार में कोई नहीं था. वो अकेले ही अपना जीवन चलाती रहीं. जब उनकी सेहत और उम्र ने जवाब देना शुरू कर दिया तो वो रैन बसेरे में आ गयीं.

मेरी मुलाक़ात जब उनसे हुई तो वो काफ़ी परेशान थीं. वो दूर किसी मंदिर जाने की बात कर रहीं थीं जहाँ उन्हें उम्मीद थी कि खाने को कुछ मिल जाएगा.

वो कहती हैं, “आम दिन होते तो कोई बात नहीं थी. हमारे लिए बंगला साहिब गुरुद्वारा ही काफ़ी था. अब वहाँ काम चल रहा है. लंगर नहीं बन पा रहा है. खाने का कोई दूसरा माध्यम नहीं है. पहले रैन बसेरे में खाना मिलता था. अब मुझे पैदल दूर के मंदिर जाना पड़ता है इस उम्मीद में कि शायद खाना मिल जाए. कभी ऐसा भी होता है जब कुछ नहीं मिलता.”

ममता देवी फ़र्राटे से अंग्रेज़ी भी बोलती हैं. मगर अब उम्र के इस पड़ाव में वो आजीविका के लिए ना तो कुछ कर सकती हैं और ना ही उनका कोई अपना है.

ये संघर्ष अकेले ममता देवी, उमेश या निर्मल दा का नहीं है. जब आप रात को शहर देखने निकलें तो फ़ुटपाथ पर ज़रूर नज़र डालें. वहाँ आपको कई ममता देवी, निर्मल दा और उमेश जी जैसे लोग दिखेंगे. कुछ अकेले सोते हुए नज़र आएंगे. कुछ परिवार के साथ.

बहुत सारी महिलाएं और बच्चे भी हैं जो कूड़ा चुन कर अपना गुज़ारा करते रहे हैं. इनके पास भी सर छुपाने के लिए कोई छत नहीं है. आम दिनों में मज़दूरी कर कमा लेते थे और खाना खा लेते थे. मगर अर्थव्यवस्था के चरमरा जाने से इनके सामने भी ज़िंदा रहने का सवाल पैदा हो गया है.

मैंने दिल्ली सरकार द्वारा बेघरों के लिए उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के नेतृत्व वाली समिति के सदस्य इंदु प्रकाश सिंह से जानना चाहा कि सरकार ने ऐसा फ़ैसला क्यों लिया है. उनका कहना था कि ये फ़ैसला किसके कहने पर लिया गया उन्हें मालूम नहीं जबकि वो सरकारी समिति के सक्रिय सदस्य हैं.

वो कहते हैं, “इसकी जानकारी मुझे मिली. मैंने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उप-मुख्यमंत्री के अलावा समिति के दूसरे सदस्यों से चर्चा भी की. एक दो दिन में रैन बसेरों में पके हुए खाने की व्यवस्था फिर से बहाल हो जाएगी क्योंकि लोगों के पास कमाने के साधन नहीं के बराबर हैं.”

रिपोर्ट लिखे जाने तक सूचना मिली कि दिल्ली की सरकार ने बेघरों के लिए पका हुआ भोजन उपलब्ध कराने का निर्णय ले लिया है और इस सम्बन्ध में अध्यादेश भी जारी किया जा रहा है.

रही बात यमुना पुस्ता में जले हुए रैन बसेरे की, तो इस चिलचिलाती धुप में जब पारा आसमान छू रहा हो, इसके मरम्मत या पुनर्निमाण के बारे में कोई फ़ैसला नहीं लिया गया है.

News Credit Bbc Hindi

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