चेन्नई19 मिनट पहले
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मद्रास हाईकोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र सरकार को सुझाव दिया कि ऑस्ट्रेलिया की तरह भारत में भी 16 साल से कम उम्र वालों के लिए सोशल मीडिया पर रोक लगाई जाए। कोर्ट ने कहा कि इसपर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
मदुरै बेंच की डिविजन बेंच जस्टिस जी जयरामन और जस्टिस के के रामकृष्णन ने यह बात नाबालिगों को ऑनलाइन पोर्नोग्राफिक कंटेंट आसानी से मिल जाने के मुद्दे पर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान कही।
कोर्ट ने कहा कि इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स (ISP) पर और सख्त नियम लागू किए जाएं। उन्हें अनिवार्य रूप से पैरेंटल विंडो सर्विस (पैरेंटल कंट्रोल) देने के लिए कहा जाए, जिससे माता-पिता अपने बच्चों की ऑनलाइन एक्टिविटी को फिल्टर और कंट्रोल कर सकें।
दरअसल, ऑस्ट्रेलिया ने 9 दिसंबर से 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अकाउंट बनाने पर बैन कर दिया है। ऑस्ट्रेलिया इस तरह का बैन लगाने वाला दुनिया का पहला देश है।
याचिका में क्या मांग की गई
यह मामला एक पुरानी जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें शिकायत की गई थी कि बच्चों को इंटरनेट पर अश्लील और पोर्नोग्राफिक कंटेंट बहुत आसानी से मिल जाती है। इस पर रोक के लिए ठोस व्यवस्था नहीं है।
याचिका में मांग की गई थी कि राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR), तमिलनाडु बाल अधिकार आयोग और इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स को निर्देश दिया जाए कि वे पैरेंटल कंट्रोल सिस्टम लागू करें और स्कूलों व समाज में बड़े स्तर पर जागरूकता अभियान चलाएं।
अदालत ने क्या कहा-
- जब तक नया कानून नहीं बनता, तब तक सरकार और आयोग जागरूकता अभियान तेज करें और बच्चों व माता-पिता को सुरक्षित इंटरनेट इस्तेमाल के तरीके सरल भाषा में समझाएं।
- स्कूलों, मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए बच्चों और अभिभावकों को सुरक्षित इंटरनेट के बारे में बताया जाए।
- ISP को मजबूर किया जाए कि वे पैरेंटल विंडो/पैरेंटल कंट्रोल जैसी सुविधा आसान तरीके से उपलब्ध कराएं।
ऑस्ट्रेलिया वाला मॉडल क्या है?
ऑस्ट्रेलिया सरकार ने नवंबर 2024 में ‘ऑनलाइन सेफ्टी अमेंडमेंट बिल’ पास किया था। इस कानून का मकसद बच्चों को ऑनलाइन हानिकारक कंटेंट और साइबर जोखिमों से बचाना है।
इसमें 16 साल से कम उम्र के बच्चों को TikTok, X (ट्विटर), फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, यूट्यूब जैसी बड़ी सोशल मीडिया साइटों से दूर रखने का प्रावधान है।
इन प्लेटफॉर्म्स को नाबालिगों के अकाउंट हटाने और उम्र की सख्त जांच (एज वेरिफिकेशन) करने की जिम्मेदारी दी गई है, हालांकि इस कानून को लेकर वहां अभिव्यक्ति की आजादी और डिजिटल अधिकारों पर बहस भी चल रही है। पूरी खबर पढ़ें…
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