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Kailash Mansarovar Yatra | First Jatha Delhi Tanakpur Uttarakhand Darshan

2025 में उत्तराखंड में पहुंचे यात्रियों का स्वागत करते लोग।

उत्तराखंड के रास्ते होने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा-2026 की तैयारियां लगभग पूरी हो चुकी हैं। बुधवार को पिथौरागढ़ जिला कार्यालय में हुई समीक्षा बैठक में जिलाधिकारी आशीष कुमार भट्टगांई ने बताया कि यात्रा के सफल संचालन के लिए सभी विभागों ने अपनी तैयारिय

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इस साल यात्रा में कुल 10 दल शामिल होंगे। प्रत्येक दल में 50 श्रद्धालु होंगे। इस तरह लिपुलेख मार्ग से कुल 500 श्रद्धालु कैलाश मानसरोवर यात्रा करेंगे। यात्रियों के आवागमन के लिए कुमाऊं मंडल विकास निगम (KMVN) की ओर से 12 वाहनों की व्यवस्था की जाएगी। KMVN के जीएम मनीष कुमार के अनुसार प्रशासन और निगम की टीमें रूट का लगातार जायजा ले रही हैं ताकि श्रद्धालुओं को किसी तरह की परेशानी न हो।

इस बार यात्रा को लेकर सबसे बड़ा बदलाव ये है कि अब लगभग पूरी यात्रा सड़क मार्ग से होगी। जहां पहले 60 किलोमीटर से ज्यादा पैदल चलना पड़ता था, वहीं अब कुल यात्रा में सिर्फ 38 किलोमीटर ट्रेक ही बचा है। पूरी यात्रा 1738 किलोमीटर की होगी, जिसमें ज्यादातर दूरी वाहन से तय की जाएगी।

हिंदू धर्म में कैलाश मानसरोवर की यात्रा को सबसे पवित्र माना गया है।

पहले जानिए आज की बैठक में क्या हुआ

  • यात्रा मार्ग की स्थिति का लिया अपडेट: बैठक में भारतीय सेना और बीआरओ के अधिकारियों से यात्रा मार्ग की वर्तमान स्थिति की जानकारी ली गई। जिलाधिकारी ने कहा कि यात्रा शुरू होने से पहले सभी जरूरी व्यवस्थाएं दुरुस्त रहें और रास्ते में आने वाली किसी भी समस्या का तुरंत समाधान किया जाए।
  • स्वास्थ्य और मेडिकल तैयारियों की समीक्षा: यात्रा मार्ग पर डॉक्टरों, विशेषकर फिजिशियन की तैनाती, एम्बुलेंस, दवाइयों और आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं की उपलब्धता की समीक्षा की गई। निर्देश दिए गए कि किसी भी स्वास्थ्य संबंधी आपात स्थिति में श्रद्धालुओं को तत्काल सहायता मिलनी चाहिए।
  • सुरक्षा, संचार और विभागीय समन्वय पर जोर: पुलिस, आईटीबीपी, सेना और अन्य एजेंसियों की तैयारियों की समीक्षा करते हुए सुरक्षा व्यवस्था मजबूत रखने के निर्देश दिए गए। साथ ही सभी विभागों के बीच बेहतर समन्वय और निर्बाध संचार व्यवस्था बनाए रखने पर भी जोर दिया गया।
  • भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों में विशेष सतर्कता: बीआरओ को संवेदनशील और क्रॉनिक भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों में विशेष निगरानी रखने के निर्देश दिए गए। मार्ग पर मलबा हटाने के लिए मशीनरी और मानव संसाधन उपलब्ध रखने तथा किसी भी बाधा की स्थिति में तुरंत कार्रवाई करने को कहा गया।
  • श्रद्धालुओं की सुविधाओं की गुणवत्ता पर फोकस: बैठक में आवास, भोजन, पेयजल, स्वच्छता और अन्य मूलभूत सुविधाओं की समीक्षा की गई। जिलाधिकारी ने कहा कि यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सुविधा सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगी और व्यवस्थाओं की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

अब कैलाश मानसरोवर की इस पूरी यात्रा के बारे में जानिए…

दिल्ली में 4 दिन की तैयारी- यहीं से तय होता है सफर

यात्रा का पहला चरण दिल्ली से शुरू होता है। शेड्यूल के अनुसार यात्री 30 जून को दिल्ली पहुंचेंगे। 1 जुलाई को पासपोर्ट और वीजा फीस कलेक्शन के साथ दिल्ली हार्ट एंड लंग इंस्टीट्यूट में स्वास्थ्य परीक्षण होगा।

2 जुलाई को ITBP बेस हॉस्पिटल में विस्तृत मेडिकल जांच की जाएगी। इसके बाद 3 जुलाई को विदेश मंत्रालय की ब्रीफिंग, चाइनीज वीजा, फॉरिन एक्सचेंज और केएमवीएन फीस जमा करने की प्रक्रिया पूरी होगी।

इन चार दिनों में यात्रियों की पूरी स्क्रीनिंग हो जाती है और जो फिट पाए जाते हैं, वही आगे यात्रा के लिए रवाना होते हैं।

दिल्ली से कैलाश तक दिन-वार सफर

4 जुलाई को पहला दल दिल्ली से टेंपो ट्रैवलर के जरिए टनकपुर के लिए रवाना होगा, जहां रात में ठहराव होगा। अगले दिन टनकपुर से धारचूला पहुंचकर यात्रियों का रात्रि विश्राम होगा।

तीसरे दिन धारचूला से गुंजी पहुंचा जाएगा। गुंजी इस यात्रा का अहम पड़ाव है, जहां यात्रियों को एक दिन रुककर मेडिकल जांच और शरीर को ऊंचाई के अनुसार ढालने (एक्लेमेटाइजेशन) की प्रक्रिया से गुजरना होता है।

इसके बाद दल कालापानी होते हुए नाभीढांग पहुंचेगा और यहां रात में ठहरेगा। अगले दिन लिपुलेख दर्रे को पार कर चीन के पुरांग काउंटी में प्रवेश किया जाएगा, जहां रात्रि विश्राम होगा।

पुरांग में एक दिन रुकने के बाद यात्री मानसरोवर और राक्षस ताल के दर्शन करते हुए आगे बढ़ेंगे। इसके बाद तारकीन पहुंचकर झिरेपु गेस्ट हाउस में ठहराव होगा, जहां से कैलाश परिक्रमा शुरू होती है।

परिक्रमा के दौरान यात्रियों को झिरेपु से ज़ुन्झुई पु और फिर आगे बढ़ते हुए चुगू तक पहुंचना होता है। इसी चरण में डोलमा पास पार किया जाता है, जो यात्रा का सबसे कठिन हिस्सा माना जाता है।

लौटते समय- कैलाश से दिल्ली तक वापसी का पूरा प्लान

कैलाश परिक्रमा पूरी होने के बाद वापसी यात्रा चुगू से शुरू होती है। यहां से दल बस के जरिए पुरांग काउंटी पहुंचता है, जहां एक बार फिर ठहराव होता है।

इसके बाद यात्रियों का दल लिपुलेख दर्रे के जरिए भारत में प्रवेश करता है और नाभीढांग होते हुए बुधी पहुंचता है। बुधी में रात्रि विश्राम के बाद अगला पड़ाव चौकोड़ी होता है, जहां पहुंचने के लिए जीप और टेंपो ट्रैवलर का उपयोग किया जाता है।

चौकोड़ी से यात्रियों को अल्मोड़ा ले जाया जाता है। यहां एक रात रुकने के बाद अगला दिन यात्रा का अंतिम चरण होता है, जिसमें अल्मोड़ा से भीमताल और हल्द्वानी होते हुए दिल्ली पहुंचा जाता है।

इस तरह पूरी यात्रा एक सर्कुलर रूट में पूरी होती है, जिसमें जाने और आने के रास्ते अलग-अलग पड़ावों से होकर गुजरते हैं, जिससे यात्रियों को कुमाऊं के अलग-अलग क्षेत्रों के दर्शन भी होते हैं।

कुल दूरी और ट्रेक- अब कितना आसान हुआ सफर

इस बार कैलाश मानसरोवर यात्रा की कुल दूरी 1738 किलोमीटर होगी। इसमें लगभग 1690 किलोमीटर यात्रा वाहन से और सिर्फ 38 किलोमीटर पैदल ट्रेक रहेगा।

साल 2019 से पहले यात्रियों को धारचूला से लिपुलेख दर्रे तक 60 किलोमीटर से ज्यादा पैदल चलना पड़ता था। रास्ते में ऑक्सीजन की कमी और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण यात्रा काफी चुनौतीपूर्ण होती थी।

अब भारत और चीन दोनों तरफ सड़क बनने के बाद यह यात्रा काफी आसान हो गई है। सीमावर्ती क्षेत्र तक वाहन पहुंचने लगे हैं, जिससे बुजुर्ग और पहली बार यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी यह यात्रा पहले की तुलना में ज्यादा सुलभ हो गई है।

क्यों खास है इस साल की यात्रा- 60 साल बाद बना दुर्लभ योग

इस साल की कैलाश मानसरोवर यात्रा धार्मिक दृष्टि से भी बेहद खास मानी जा रही है। 60 वर्षों बाद अग्नि अश्व वर्ष का दुर्लभ योग बन रहा है, जिसे हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म में मोक्ष प्राप्ति का महत्वपूर्ण समय माना जाता है।

तिब्बती ज्योतिष दौलत रायपा के अनुसार यह 60 साल के चक्र का विशेष वर्ष होता है। मान्यता है कि इस वर्ष की गई एक परिक्रमा का फल सामान्य वर्षों की 12 परिक्रमा के बराबर होता है।

इसी वजह से इस बार देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर से श्रद्धालुओं के इस यात्रा में शामिल होने की संभावना जताई जा रही है।


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