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संघ के 100 साल: जब बैन की काट के तौर पर ABVP के बैनर तले होती थीं RSS की बैठकें – rss meetings banned abvp student union sangh 100 years story ntcppl

राजनीतिक गलियारों में पिछले कुछ साल से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से ज्यादा नजर रखी जाने लगी है. उसकी वजह भी है. पिछले ढाई दशक में जितने भी बीजेपी के बड़े चेहरे सामने आए हैं, उनमें से ज्यादातर की पृष्ठभूमि एबीवीपी की रही है. चाहे फिर वो अमित शाह हों या फिर अरुण जेटली, जेपी नड्डा हों या सुनील बंसल, मोहन यादव हों या फिर पुष्कर सिंह धामी. संघ के सहयोगी संगठनों में भी विद्यार्थी परिषद के पुराने नेताओं को अहम जिम्मेदारियां दी जा रही हैं. संघ की कोर टीम से सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले हों या प्रचार प्रमुख सुनील आम्बेकर, दोनों विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री रह चुके हैं. वहीं एबीवीपी  के पुराने प्रचारकों जैसे मनोज वर्मा को विश्व हिंदू परिषद में और श्रीनिवास को किसान संघ में भेजा जाना भी दिखाता है कि विद्यार्थी परिषद संघ परिवार में अहम स्थान रखता है.

शुरुआती दिनों से ही संघ शाखा विस्तार में लगा हुआ था और उसमें भी विद्यार्थी ही अहम भूमिका निभा रहे थे, यहां तक कि प्रचारक भी वही बने और देश भर में कई राज्यों में पहली शाखा उन्होंने ही लगाई, संघ को अलग से किसी विद्यार्थी संगठन की जरूरत नहीं रही. लेकिन एबीवीपी की अब तक की यात्रा को समेटने वाले ‘ध्येय यात्रा’ नाम के ग्रंथ में लिखा है कि, स्वतंत्रता के बाद संघ ने पुनर्निर्माण का लक्ष्य बनाया और ये भी तय किया कि देश के सभी आयु वर्गों की शक्ति इस काम में लगनी चाहिए. इसी से सोच उभरी कि देश के महाविद्यालयीन विद्यार्थियों को एक संगठन के रूप में इस कार्य में लगाना चाहिए.

मनोज कांत, प्रदीप राव और उपेन्द्र दत्त के सम्पादन में प्रभात प्रकाशन से छपे 2 खंडों के इस ग्रंथ ‘ध्येय यात्रा’ के अनुसार, “यद्यपि संघ ने वैचारिक तौर पर ही यह सोचा था, परंतु 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के विवाद में जब संघ को प्रतिबंध झेलना पड़ा तो उसने तुरंत ही छात्र संगठन बनाने की पहल की. परिणामत: जून 1948 में ‘अभाविप’ का जन्म हुआ. जुलाई 1948 के ‘पांचजन्य’ समाचार पत्र ने एक विज्ञप्ति को प्रकाशित करते हुए लिखा कि- विभिन्न विद्यार्थी संगठनों की दलबंदी एंव घृणित राजनीति से ऊब कर देश के प्रगतिशील तत्वों ने ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ संगठन बनाने का निश्चय किया है”.

इसमें आगे जानकारी मिलती है कि एबीवीपी का विधिवत पंजीयन (रजिस्ट्रेशन) 9 जुलाई 1949 को हुआ. एबीवीपी की वेबसाइट ये भी बताती है कि इसका पहला अधिवेशन या सम्मेलन 1948 में अम्बाला में हुआ था. पहले अध्यक्ष प्रोफेसर ओमप्रकाश बहल और पहले महामंत्री केशव देव वर्मा बनाए गए थे. ‘ध्येय यात्रा’ ये भी बताती है कि इन्हीं दिनों पंजाब और जम्मू में राष्ट्रवादी विचारों से प्रेरित ‘स्टूडेंट्स नेशनलिस्ट एसोसिएशन’ नाम से एक अन्य संगठन भी बना था, जिसका 1952 में एबीवीपी में ही विलय कर दिया गया था.

हालांकि अन्य स्रोतों से ये भी जानकारी मिलती है कि जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष बलराज मधोक से लेकर दत्तोपंत ठेंगड़ी जैसे मजदूर नेता सहित कई संघ प्रचारकों ने भी शुरूआत में एबीवीपी की स्थापना में अहम भूमिका निभाई थी. चूंकि संघ प्रमुख गुरु गोलवलकर उन दिनों ज्यादातर समय या तो जेल में थे या संघ पर प्रतिबंध हटाने के लिए लड़ रहे थे, सो भैयाजी दाणी और बालासाहब देवरस की तो सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही ही होगी. वहीं एबीवीपी के पूर्व पदाधिकारी और पूर्व बीजेपी विचारक के एन गोविंदाचार्य ने एक साक्षात्कार में ये भी दिलचस्प बात बताई कि प्रतिबंध के चलते संघ के अधिकारी उन दिनों जो गुप्त बैठकें करते थे, वो भी एबीवीपी के बैनर तले ही करते थे.

हालांकि सभी स्रोत और खुद विद्यार्थी परिषद, संगठन का आर्किटेक्ट महाराष्ट्र के प्रोफेसर यशवंत राव केलकर को ही मानते हैं और उन्हीं की वजह से एक छोटे से पौधे ने आज ऐसे वटवृक्ष का रूप ले लिया है, जो तमाम देशों में वर्ल्ड ऑर्गनाइजेशन ऑफ स्टूडेंट एंड यूथ (WOSY) के नाम से एक संगठन चला रहा है. उत्तर पूर्व के छात्रों को शेष भारत के युवाओं के निकट लाने के लिए Students’ Experience in Interstate Living (SEIL) नाम का प्रकल्प भी एबीवीपी ने खड़ा किया है.
 
अटलजी और दत्तोपंत ठेंगड़ी को भी लेना पड़ा ABVP का पद

जम्मू कश्मीर अध्ययन केन्द्र के निदेशक आशुतोष भटनागर भी पहले एबीवीपी से जुड़े रहे हैं, वो आजादी के तुरंत बाद की कुछ दिलचस्प घटनाओं की जानकारी देते हुए गोविंदाचार्य की जानकारी को और विस्तार देते हैं. वो बताते हैं कि, “प्रतिबंध के दौरान परिषद के पद संघ के कई बड़े नेताओं को दे दिए गए थे. जैसे दत्तोपंत ठेंगड़ी को विद्यार्थी परिषद का विदर्भ प्रांत में संगठन मंत्री बना दिया गया था तो अटल बिहारी बाजपेयी को परिषद के अभियान ‘भारतीयकरण उद्योग’ आंदोलन का संयुक्त प्रांत का संयोजक बना दिया गया था”.

RSS के सौ साल से जुड़ी इस विशेष सीरीज की हर कहानी 

विद्यार्थी परिषद जैसे संगठन की जरूरत के पीछे एक दिलचस्प जानकारी इलाहाबाद से दो खंडों में प्रकाशित ‘छात्र आंदोलन का इतिहास’ से भी मिलती है. तब संयुक्त प्रांत में कांग्रेस की सरकार थी, गोविंद बल्लभ पंत उसके मुख्यमंत्री थे. आजादी से पहले अचानक उन्होंने छात्रों की फीस बढ़ा दी. इससे छात्र नाराज हो गए, समाजवादी छात्र संगठन भी मुखर थे, क्योंकि कांग्रेस के अंदर के नरेन्द्र देव जैसे नेताओं का उन्हें सहयोग था. नरेन्द्र देव पंत से मिले और कहा कि एक बार छात्रों से मिल लीजिए. पंत का जवाब एकदम रूखा था, “बातचीत तो बराबर के स्तर पर होती है, मैं सीएम होकर कॉलेज के छात्रों से बात करूं?”. उसके बाद छात्र और नाराज हो गए. 2 अगस्त को यूपी पुलिस ने आंदोलन कर रहे छात्रों पर बनारस में गोलियां चलवा दीं”.  इससे पूरे देश में ये संदेश गया कि अंग्रेजों और कांग्रेस की सरकार में कोई फर्क नहीं है. अलग अलग जगह पर कई छात्र संगठन खड़े हुए, कई संगठन या उनके नेता कालांतर में विद्यार्थी परिषद से जुड़ते चले गए.
 
‘नेता से नहीं, गुरु से मार्गदर्शन लेंगे’

हालांकि संघ से प्रतिबंध हटने के बाद भी ऊहापोह जैसी स्थिति रही कि परिषद को आगे बढ़ाना है कि नहीं. सो कई साल ऐसे ही गुजर गए, लेकिन एबीपीवी अपना काम करता रहा. एबीवीपी का स्वरूप कैसा हो इसके लिए शुरुआत में ही काफी चिंतन हुआ था. कहीं ये बाकी संगठनों की तरह किसी पॉलीटिकल पार्टी का पिछलग्गू तो नहीं बनकर रह जाएगा, ये सवाल संघ के अधिकारियों के मन में भी था. सो कई दौर के चिंतन के बाद उसका स्वरूप स्पष्ट हुआ. चूंकि तब ना तो जनसंघ था और ना ही बीजेपी, संघ का तब इरादा भी नहीं था कि राजनीति में जाया जाए. लेकिन गांधी हत्या में जिस तरह आरोप लगे, प्रतिबंध लगा, उससे उनको ये जरूर लगने लगा था कि सड़क पर उतरने के लिए, उनके लिए लड़ने के लिए युवाओं का संगठन तो होना ही चाहिए.

राष्ट्रीयता के आधार पर छात्रों को संगठित किया गया. (Photo: AI generated)

तय यही किया गया कि यह एक स्वतंत्र संगठन होगा. संघ से प्रचारक चाहेगा या सलाह चाहेगा तो जरूर मिलेगी. यह भी तय किया गया कि छात्रों के मार्गदर्शक के दौर पर इस संगठन में अध्यापक और शिक्षाविद भी रहेंगे. हर इकाई का अध्यक्ष हमेशा अध्यापक ही रहेगा. इससे ये सुनिश्चित करना था कि एकदम उद्दंड बेकाबू छात्रों का संगठन ना बनकर रह जाए. उन्हें राजनेताओं के बजाय अध्यापकों का मार्गदर्शन मिले. तभी तो एबीवीपी का आर्किटेक्ट मुंबई यूनीवर्सिटी के प्रोफेसर य़शवंतराव केलकर को ही माना जाता है. कई बार के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रोफेसर राजकुमार भाटिया ने तो अरुण जेटली और रजत शर्मा जैसे दिग्गजों को विद्यार्थी परिषद में तैयार किया था. वो अब भी सक्रिय हैं. गुजरात आंदोलन की सफलता के बाद जेपी के साथ सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन में एबीवीपी की बड़ी भूमिका थी. सुशील मोदी, रविशंकर प्रसाद, हरेन्द्र प्रताप सिंह जैसे दिग्गज चेहरे उसी आंदोलन की उपज थे.
 
संघ से जब प्रतिबंध हटा, तो जनसंघ को वो अपने पांच बड़े चेहरे दे चुका था, जाहिर है सबका ध्यान उधर भी था. कई अन्य संगठन उन दिनों शुरू हुए, बंटवारे के बाद लम्बा समय शरणार्थियों की समस्या में भी चला गया. उसके बाद गोहत्या विरोध में आंदोलन चला. ऐसे में एबीवीपी को ना तो भंग किया गया और ना ही उस संगठन पर ज्यादा ध्यान दिया गया. एबीवीपी के जितने पदाधिकारी थे, वो बिना रुके संगठन को चलाते ऱहे.   
 
‘ध्येय यात्रा’ में विद्यार्थी परिषद की स्थापना के सम्बंध में दो अखबारों की खबरों की कतरनें छापी गई हैं. जिनमें से एक का शीर्षक है, ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की स्थापना’. उसके ठीक नीचे एक उप-शीर्षक भी लगा था, ‘विशुद्ध राष्ट्रीयता के आधार पर विद्यार्थियों को संगठित होना चाहिए’. ये खबर कम प्रेस रिलीज ज्यादा थी, जिसमें ये बताने के बजाय कि ये संगठन कौन शुरू कर रहा है, इसके अध्यक्ष, महामंत्री या संयोजक कौन हैं, इस बात पर जोर दिया गया था कि राष्ट्रीय विचार वाले छात्र संगठन की क्यों जरूरत है, कैसे विदेशी संस्कृति के प्रभाव से हम अपनी संस्कृति भूल बैठे हैं. कैसे लिंकन, लेनिन, गैरीबाल्डी जैसे विदेशी महापुरुष और शैक्सपियर, वर्ड्सवर्थ और ब्राउनिंग जैसे विदेशी कवि ही आज भी हमारे स्फूर्ति केन्द्र हैं. ये लिखकर भी बाकी छात्र संगठनों पर निशाना साधा गया था कि आज वो राजनीतिक दलो की स्वार्थ सिद्धि के साधन होकर, उनके नेताओं के हाथों नाचने लगे हैं. ये भी लिखा गया कि विद्यार्थी शिक्षा का उद्देश्य आज क्या होना चाहिए. पुरानी कतरन है, सो सारे शब्द भी स्पष्ट नहीं हैं. लेकिन एबीवीपी के उद्देश्य कुछ बिंदुओं में लिखे हैं, उन्हें पढ़ना थोड़ा आसान था. उस खबर की कतरन के अनुसार
हमारा शुद्ध राष्ट्रीय आधार पर संगठन हो.
हम दलबंदियों से ऊपर उठें.
हृदय से साम्प्रदायिक और भेदमूलक विचारों को उखाड़ फेंकें.
हम अपना दृष्टिकोण पूर्णतया निष्पक्ष और राष्ट्रीय बनाएं.
हम अपना एक सुअनुशासित तथा प्रजातांत्रिक विद्यार्थी संगठन बनाएं.
अध्यापकों तथा विद्यार्थियों के सम्बंधों को सुंदर बनाकर, संशय का वातावरण मिटा, संघीय राष्ट्र के निर्माण में उनकी शक्तियों का सदुपयोग करें

 
भारत बनाम इंडिया, हिंदी बनाम हिंदुस्तानी और वंदेमातरम बनाम जन गण मन का सर्वे

इस समाचार में एबीवीपी के हवाले से ये भी लिखा गया है कि हमने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के द्वारा इन उद्देश्यों को पूरा करने का निश्चय किया है. हड़तालों में हमारा विश्वास नहीं है. वहीं पत्रिका ‘आकाशवाणी’ की 14 अगस्त 1949  की खबर की कतरन विद्यार्थी परिषद के शायद पहले कार्यक्रम की जानकारी देती है. ये कार्य़क्रम एक सर्वे था, जो 9 जुलाई 1949 को एबीवीपी की स्थापना के फौरन बाद संगठन ने 24 से 31 जुलाई 1949 तक करवाया था. इस खबर का शीर्षक था, ‘बहुसंख्यक जनता का स्वतंत्र निर्णय, हिंदी भारत और वंदेमातरम के पक्ष में’. उपशीर्षक था, ‘भारतीयकरण उद्योग जनमत संग्रह’.

आशुतोष भटनागर बताते हैं कि उन दिनों देश में संविधान सभा की बैठकें चल रही थीं, वहां से खबरे छन छनकर बाहर आ रही थीं. ऐसे में विद्यार्थी परिषद ने संविधान संभा से उद्योगों के भारतीयकरण की मांग लेकर ‘भारतीयकरण उद्योग’ नाम से एक अभियान शुरू किया था. उन दिनों चूंकि संघ पर प्रतिबंध था, सो संघ के कई अधिकारी भी इस बैनर तले काम कर रहे थे. अटलजी ने खुद संयुक्त प्रांत के प्रभारी का जिम्मा ले लिया था. इसी अभियान के तहत एबीवीपी ने जुलाई के आखिरी सप्ताह में एक जनमत संग्रह करवाया. इसमें ये पूछा गया था कि देश का नाम क्या हो, भारत या इंडिया या कोई और, राष्ट्रगीत क्या हो जन गण मन या वंदेमातरम या कोई और. विधान की भाषा क्या हो, हिंदी, हिंदुस्तानी या कोई और?   

कुल 26 लाख लोगों ने देश भर में इस जनमत संग्रह में भाग लिया था. जिनमें से हिंदी चाहने वाले 22,34,521 थे, जबकि हिंदुस्तानी को 1,83,356 मत मिले. देश का नाम भारत हो, इसके लिए मत देने वालों की संख्या थी 23,72,152 तो इंडिया नाम पसंद करने वाले थे 71,329. वंदेमातरम के पक्ष में 5,19,435 मत मिले तो जन गण मन के पक्ष में 73,472. हिंदी विधान की भाषा हो, इसके लिए 25,27,364 लोगों ने मत दिया तो अंग्रेजी विधान की भाषा हो इसके लिए 7873 लोगों ने अपना मत दिया. इस खबर में ये भी दावा किया गया है कि इस सर्वे में बड़ी संख्या में मुसलमानों ने भी भाग लिया.      

पिछली कहानी: जब RSS के कार्यक्रम में आने से नेपाल के राजा को रोक दिया था भारत सरकार ने 

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