ईरान के खिलाफ करीब एक महीने से जारी युद्ध के बाद, वैश्विक ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी और अपनी गिरती लोकप्रियता के बीच माना जा रहा है कि डोनाल्ड ट्रंप के सामने दो ही कड़े विकल्प बचे हैं, या तो एक समझौता करके इस मुश्किल से बाहर निकलें, भले वह कमजोर क्यों न हो, या फिर सैन्य कार्रवाई तेज करें और लंबे संघर्ष का जोखिम उठाएं, जो कि ट्रंप के पूरे कार्यकाल को भी प्रभावित कर सकता है.
तेज होती कूटनीतिक गतिविधियों के बावजूद, मध्य पूर्व के संकट को लेकर ट्रंप की मुश्किलें हल होती नहीं दिख रही है . ईरान खाड़ी क्षेत्र में तेल और गैस आपूर्ति पर अपनी पकड़ बनाए हुए है और लगातार मिसाइल व ड्रोन हमले कर रहा है.
विश्लेषकों के मुताबिक अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि ट्रंप इस संघर्ष को खत्म करने की दिशा में कदम बढ़ाएंगे या इसे और तेज करेंगे. आलोचकों का कहना है कि यह “चॉइस का युद्ध” अब तक के सबसे बड़े वैश्विक ऊर्जा संकट में बदल चुका है और इसका असर क्षेत्र से कहीं आगे तक फैल गया है.
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ट्रंप नहीं चाहते लंबा युद्ध
जानकारी के मुताबिक, ट्रंप ने अपने सहयोगियों से कहा है कि वह “लंबा चलने वाला युद्ध” नहीं चाहते और बातचीत के जरिए बाहर निकलना चाहते हैं. उन्होंने सार्वजनिक तौर पर 4 से 6 हफ्तों की समयसीमा की बात भी कही है, हालांकि एक वरिष्ठ व्हाइट हाउस अधिकारी के मुताबिक यह समयसीमा “अनिश्चित” लग रही है.
इसके साथ ही, ट्रंप ने चेतावनी दी है कि अगर बातचीत विफल होती है, तो वह बड़े सैन्य कदम उठा सकते हैं.
ईरान के साथ बातचीत के लिए ट्रंप की कोशिशें, जिसमें पाकिस्तान के जरिए भेजा गया 15 बिंदुओं का शांति प्रस्ताव भी शामिल है. यह दिखाती हैं कि वह इस स्थिति से निकलने का रास्ता तलाश रहे हैं. हालांकि, अभी यह साफ नहीं है कि किसी ठोस समझौते की वास्तविक संभावना मौजूद है या नहीं.
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